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ऑनलाइन गेमिंग पर सरकार का बड़ा फैसला
भारत सरकार ने 21 अगस्त 2025 को पारित किए गए ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 के जरिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया।
इस कानून के लागू होते ही—
- सभी पैसे से चलने वाले ऑनलाइन गेम्स को तुरंत बंद करने का आदेश दिया गया।
- अब भारत में किसी भी तरह का रीयल-मनी गेमिंग अवैध हो गया है।
- बैंकिंग चैनल्स और विज्ञापनों पर भी पाबंदी लगा दी गई है।
इसके बाद देश की सबसे बड़ी गेमिंग कंपनियाँ जैसे Dream11, MPL, Zupee और PokerBaazi ने अपने पेड सर्विसेज पर ताला जड़ दिया।
किन ऐप्स पर सबसे ज्यादा असर?
- Dream11 और MPL: फैंटेसी क्रिकेट और ई-स्पोर्ट्स पर आधारित ये ऐप अब सिर्फ फ्री टूर्नामेंट्स तक सीमित रहेंगे।
- Zupee: कंपनी ने कहा कि वह सिर्फ फ्री गेम्स जैसे लूडो और स्नेक्स-एंड-लैडर्स जारी रखेगी।
- PokerBaazi: पोकर खेलने वाले सभी कैश टेबल बंद कर दिए गए हैं।
- Google व Apple: दोनों ने ऐप स्टोर से इन प्लेटफॉर्म्स को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
सबसे अहम सवाल: यूजर्स का बैलेंस क्या होगा?
लाखों यूजर्स जिनके पैसे इन ऐप्स में अटके हैं, उनके लिए सरकार ने कुछ नियम तय किए हैं—
- कंपनियों को यूजर्स की राशि अलग खाते में सुरक्षित रखनी होगी।
- सेवा बंद होने पर पूरा बैलेंस रिफंड करना अनिवार्य है।
- यदि पैसा समय पर न मिले तो ऑनलाइन गेमिंग ट्रिब्यूनल और उपभोक्ता कोर्ट में शिकायत की जा सकती है।
इसलिए संभावना है कि यूजर्स को उनके पैसे मिल जाएंगे, लेकिन रिफंड की प्रक्रिया कितनी तेज़ होगी, यह कंपनियों पर निर्भर करेगा।
इंडस्ट्री और निवेशकों की चिंता
- इस कदम से लगभग 25,000 करोड़ रुपये का निवेश और दो लाख से ज्यादा नौकरियाँ खतरे में हैं।
- सरकार के टैक्स रेवेन्यू पर भी सीधा असर पड़ेगा।
- कई स्टार्टअप फाउंडर्स ने सरकार की आलोचना की है और कहा है कि इससे अवैध व ऑफशोर ऐप्स को बढ़ावा मिल सकता है।
यूजर्स को अभी क्या करना चाहिए?
- अपने ऐप अकाउंट्स में जाकर बैलेंस विदड्रॉल करने की कोशिश करें।
- कंपनी की ओर से आए नोटिफिकेशन या मेल्स को ध्यान से पढ़ें।
- यदि रिफंड न मिले तो कस्टमर सपोर्ट, ट्रिब्यूनल या कंज्यूमर फोरम से संपर्क करें।
- किसी भी अनधिकृत या विदेशी ऐप पर पैसा लगाने से बचें।
निष्कर्ष
भारत में ऑनलाइन मनी गेम्स पर यह प्रतिबंध एक गेम-चेंजर फैसला है।
जहाँ कंपनियाँ भारी नुकसान की बात कर रही हैं, वहीं यूजर्स की सबसे बड़ी चिंता अपने पैसों की सुरक्षा को लेकर है।
कानून साफ है—रिफंड मिलना ही चाहिए, लेकिन अब गेंद कंपनियों के पाले में है कि वे कितनी ईमानदारी से इसे लागू करती हैं।